कुलीना ने अपनी काव्य संग्रह ‘आवाज मेरे मन की’  में कुलीनतावाद और पितृसत्ता की उड़ाई धज्जियां: नरेन्द्र मोहन

नई दिल्ली: गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान द्वारा संचालित सन्निधि संगोष्ठी में युवा कवयित्री कुलीना कुमारी के कविता संग्रह ‘आवाज मेरे मन की’ का  लोकार्पण किया गया.

इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. नरेन्द्र मोहन ने कहा कि आवाज मेरे मन की लेखिका का नाम तो कुलीना है मगर अपनी कविताओं में कुलीनतावाद और पितृसत्ता की धज्जियां उड़ा दी है. उन्होंने  कुलीना की एक कविता ‘छुप जाऊं ‘ का जिक्र करते हुए कहा कि कुलीना ने अभिव्यक्ति के खतरे उठाए हैं. इस मौके पर गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा  की मंत्री कुसुम शाह भी मौजूद थी.

कार्यक्रम की अध्यक्षता मुकेश भारद्वाज ने की. उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए कविता लिखना आसान नहीं, उसमें भी बेबाकपूर्ण कविता बड़ी बात है. जैसी  बातें कविताओं में आती है, वैसा माहौल भी पुरुषों को बनाना चाहिए.

 

अतिथियों का स्वागत विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के मंत्री श्री अतुल प्रभाकर ने किया‌और संचालन प्रसून लतांत व किरण आर्या ने किया. पुस्तक की कवयित्री कुलीना कुमारी ने अपने रचना कर्म पर बात रखते हुए कहा कि मैने लिखना 12 साल की अवस्था से ही शुरू किया, धीरे-धीरे यह बढता गया. किताब ‘आवाज मेरे मन की’ सिर्फ मेरी आवाज नहीं, हर नारी मन की आवाज है.

हालांकि अपनी कविताओं के लिए बहुत कुछ झेलना पड़ा, लोगों ने गालियां और धमकी भी दी.

विशिष्ट अतिथि प्रियदर्शन ने कहा कि जैसी साहसपरक कविताएं लिखी गयी है, वैसी कविता कुलीना ही लिख सकती है.

पुस्तक चर्चा में अनिता भारती, लाडो कटारिया, इन्दुमति, शब्द मसीहा, अनुराधा कनौजिया, ममता धवन, अंजु कांवले, अनुज, सोमा विश्वास सहित कई लोगों ने अपने विचार रखें.

डां पूरन सिंह, नीति राठौर, मधु गुप्ता, अखिलेश शुक्ला, रमेश शर्मा, राज कुमार, सुधीर, शुक्रिया, राम कुमारी देवी, रश्मि प्रमोद, अनुराधा प्रभाकर, सहित कई लोग उपस्थित थे.

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